औरतें,,,,, खुश होती हैं सिंगार करके वो नही करतीं सिंगार,,, अपने लिए वो सजती-सँवरती हैं,,,,,जब हो कोई,,, चाहने वाला पति निहारने वाला प्रेमी तारीफें उड़ेलने वाली सखियाँ नज़र उतारने वाले रिश्ते इतराती थी कभी मैं भी ढेरों सिंगार करके चाहत, इनायत, तारीफें, दुलार,,जी भर बरसे आज रखे हैं सामने,,,मेहंदी, चूड़ी, बिंदी, काजल और,,,, खुश होने को बावरा मन भी तरसे लेकिन ,,,,नहीं है कोई,,, मेहंदी रचे हाथों को प्यार से चूमने वाला जाते जाते पलट कर एक निगाह मन भर निहारने वाला कोई नहीं,,,,दो बोल तारीफों के देने वाला न ही,,,,लाड़ से नज़र उतारने वाला बस कानों में गूँजती, मन को भेदती कुछ दबी जुबान से निकली आवाज़ें हैं -क्या ज़रूरत है इसे सिंगार की,, -आखिर क्यूँ, किसके लिए इतना बन-संवर रही है -होगी ही ऐसी,,,तभी ये सब हुआ इसके साथ और दोनो हाथों से कानो में पड़ते सीसे को रोककर चुपचाप बैठ जाती हूँ,,, अपने बेरंग से कोने में,,,, न न,,, विधवा नहीं हूँ,,, सुहागन भी नहीं हूँ,,, #परित्यक्ता हूँ मैं #मैं_मानवी