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Showing posts from August, 2018

बेचैन मन

बाहर झाँकू भीतर झाँकू ऊपर ताकूँ, नीचे ताकूँ बेलगाम भागते से मन को,,अपने जिस्म पे कैसे टांकूँ जाने किसके इंतज़ार में जागे घड़ी की टिक-टिक के संग भागे नींद पुकारे, मन भगाए खुद को दो हिस्सों में बाँटू बेलगाम भागते से मन को,,अपने जिस्म पे कैसे टांकूँ बेवजह का शोर मचाये, कभी बिठाए कभी उठाये चैन नही लेने दे पल भर, बेचैनी संग खेल रचाये रोता है बच्चों के जैसा थक के जब भी इसको डाँटू बेलगाम भागते से मन को,,अपने जिस्म पे कैसे टांकूँ राह किसी की तकती हरदम सूनी आँखें, कोरे हैं नम साँझ उतरती जाती मन में साँसे होती जाती मद्धम मुश्किल है एक रात काटनी,,,,,,,, इस लम्बी उमर को कैसे काटूँ बेलगाम भागते से मन को,,अपने जिस्म पे कैसे टांकूँ -है
औरतें,,,,, खुश होती हैं सिंगार करके वो नही करतीं सिंगार,,, अपने लिए वो सजती-सँवरती हैं,,,,,जब हो कोई,,, चाहने वाला पति निहारने वाला प्रेमी तारीफें उड़ेलने वाली सखियाँ नज़र उतारने वाले रिश्ते इतराती थी कभी मैं भी ढेरों सिंगार करके चाहत, इनायत, तारीफें, दुलार,,जी भर बरसे आज रखे हैं सामने,,,मेहंदी, चूड़ी, बिंदी, काजल और,,,, खुश होने को बावरा मन भी तरसे लेकिन ,,,,नहीं है कोई,,, मेहंदी रचे हाथों को प्यार से चूमने वाला जाते जाते पलट कर एक निगाह मन भर निहारने वाला कोई नहीं,,,,दो बोल तारीफों के देने वाला न ही,,,,लाड़ से नज़र उतारने वाला बस कानों में गूँजती, मन को भेदती कुछ दबी जुबान से निकली आवाज़ें हैं -क्या ज़रूरत है इसे सिंगार की,, -आखिर क्यूँ, किसके लिए इतना बन-संवर रही है -होगी ही ऐसी,,,तभी ये सब हुआ इसके साथ और दोनो हाथों से कानो में पड़ते सीसे को रोककर चुपचाप बैठ जाती हूँ,,, अपने बेरंग से कोने में,,,, न न,,, विधवा नहीं हूँ,,, सुहागन भी नहीं हूँ,,, #परित्यक्ता हूँ मैं -विभा
मैं,,,, क्या सच में मैं ही हूँ,,, कभी सोचा ही नहीं कि मुझमें कोई #मैं भी है जो भी मिला वो एहसान जता गया- "मैंने तुम्हारे लिए ये किया, मैंने तुम्हारे लिए वो किया" हर एक के #मैं का मान रखा- हाँ तुमने किया लेकिन मेरा #मैं,,,, न कभी मैंने दिखाया, न किसी ने देखना चाहा जो भी मिला वो अपनी काबिलियत समझा गया "मैं ये हूँ, मुझे वो आता है" हर एक के मैं का सम्मान किया- हाँ तुम हो लेकिन मेरा वजूद,,,, न कभी मैंने दिखाया, न किसी ने देखना चाहा क्या समझूँ खुद को अब बिना अहम की #मैं,,, बिना वजूद की #मैं #मैं_विभा

बरसाती शायर

ये जो फेसबुक पर दिखते हैं न,,, बरसात के मौसम में शायरी करते लोग कहते हो तुम इनको,,,, -बरसाती शायर -कुकुरमुत्ते -फेसबुक पर जमने वाली काई कभी पूरा साल नोटिस किया है इन सबको !!! ये गर्मियों में भी लिखते हैं,,,, तपती लू में चौराहे पर भीख माँगते बच्चों के लिये हाँफते प्यासे,,,, मकान बनाते मजदूरों के लिये पसीने में तर,,,रसोई में खाना बनाती स्त्री के लिये ये सर्दियों में भी लिखते हैं,,, रात में फुटपाथ पर सिकुड़े शराबियों के लिए अलाव सेंकते,,,, गाँव के बूढों के लिए रातों को उठ उठ कर बच्चे को ओढाती माँ के लिए सबके लिये मन पिघलाते, लिखते ये शायर,,, बरसात में अपने ह्रदय की हूक सुन पाते हैं महसूस कर पाते हैं,,, अपने ही दर्द को कहीं अंदर छुपा रखे प्रेम को कागज़ पर उकेरना चाहते हैं ये बूँदें कभी उनको भिगो जाती हैं मिलन की उमंग जगा जाती हैं कभी कभी उनकी रूह तक सुलगा जाती हैं बिछोह के दर्द को ताज़ा कर जाती हैं लिखने दो इनको जी भर के खुद को पहचानने और जाहिर करने का मौसम,,,, इनके लिए बार-बार नहीं आता समझो इनको, सराहो इनको, उत्साहित करो कहीं घुट न जायें, कहीं खो न जायें ये...

सावन की खूबसूरती

सुनो,,, माना के तुम दुखी हो, रो रहे हो लेकिन ये इतने प्यारे बरसात के मौसम को रोता हुआ काहे बनाये हो,,,, -मेरे दुख से मौसम भी पिघल गया -मेरी सिसकियों से बादल का सीना फट गया -ये आसमान भी मेरे साथ आँसू बहा रहा है ये नन्ही नन्ही बूँदें कैसे खेलती मुस्कुराती सी ज़मीन पर आती हैं, कितने चेहरों पर मुस्कुराहटें लाती हैं,,,, फिर तुम्हें ये आँसू क्यूँ नज़र आती हैं !!!! देखो तो,,,, आसमान ने तुम्हारे लिए आँसू नहीं बल्कि तुम्हारे दुखों का लेप भेजा है, समेट लो इस मौसम की ठंडक को मानसून की इन मासूम बूंदों को इस सोंधी सी महक को आत्मा तक समा लो याद करो इस मौसम की सुहानी यादों को इन हवाओं के साथ झूम कर देखो इन बूँदों के साथ ताल मिलाकर देखो यादों के साथ साथ पैरों का भी नर्तन करो इस संगीत में अपना रुदन न भूल जाओ तो कहना हर बार आँसू ही नहीं होता, पानी का बहना -विभा

लक्ष्मी- घर की या तिजोरी की

घर की लक्ष्मी बना कर लाये थे न तुम मुझे लक्ष्मियाँ होती ही हैं तिजोरी में कैद होने के लिए उन पर ढेरों पिन लगाई जाती हैं उनको बाँध के रखा जाता है अल्मारी के कोनों में सबकी नजरों से दूर,,, छिपा कर तुमने दीं मुझे,,,,जी भर कर गालियाँ अभी तक मेरे दिमाग में गड्ड मड्ड होती है क्यों नहीं बोल पाई पलट कर,,,, क्या थे ये मेरे संस्कार या नहीं सीखा कभी अन्याय का प्रतिकार बरसाए तुमने मेरे गालों पर तमाचे अभी तक कानों में उनकी आवाज़ें गूँजती है क्यूँ नहीं उठा पाई पलट कर हाथ,,,, कस के होठों को भींच लिया आँसुओं से जिस्म सींच लिया गिराया था तुमने धक्का देकर, बाँह पकड़कर खींचा था एक अजन्मी जान,,,मेरे अंदर ही दुनिया त्याग गयी थी क्यूँ नहीं मैं भी उसके साथ ही चली गयी क्या ये मेरे और जीने की इच्छा थी या मेरे भाग्य के दुख पूरे नहीं हुए थे कभी दुर्गा नहीं बन पाई, जो तुम पर हथियार उठा लेती कभी काली नहीं बन पाई, जो तुम्हें भस्म कर देती कभी सरस्वती नहीं बन पाई, जो तुम्हें समझा पाती बस लक्ष्मी ही बनी रही,,,,, तुम्हारे घर की नहीं,,,,,,, तिजोरी की लक्ष्मी,,,,,, और लक्ष्मियाँ प्रतिकार नही...