हक़
हाँ.... ऐसी ही हूँ मैं नहीं जता पाती खुद को नहीं बता पाती तुमको कुछ बुरा लगे तो भी, अच्छा लगे तो भी बुरा लगे तो इसलिए नहीं बोलती कि कहीं तुम्हें भी कुछ बुरा न लग जाये अच्छा लगे तो इसलिए नहीं बोलती कि कहीं मेरी ही नज़र न लग जाये चुप हो जाती हूँ बस और यकीन मानो... ये चुप्पी खुद को संभालने के लिए होती है उस बुरे और अच्छे से खुद को अलग करने के लिए होती है तुमसे दूर जाने के लिए तो बिल्कुल भी नहीं दूर तो कभी जा ही नहीं सकती न इस तरह से बाँध दिया है तुमने वादों में ....बिना किसी हक़ के..... अच्छा सुनो मिलना है तुमसे एक बस पहली और आखिरी बार तुम्हारे काँधे पर सर रखकर फफक कर रो सकूँ कि तुम पहले क्यूँ नही मिले मुझे इतना हक़ तो दोगे न...