बरसाती शायर

ये जो फेसबुक पर दिखते हैं न,,,
बरसात के मौसम में शायरी करते लोग
कहते हो तुम इनको,,,,
-बरसाती शायर
-कुकुरमुत्ते
-फेसबुक पर जमने वाली काई

कभी पूरा साल नोटिस किया है इन सबको !!!

ये गर्मियों में भी लिखते हैं,,,,
तपती लू में चौराहे पर भीख माँगते बच्चों के लिये
हाँफते प्यासे,,,, मकान बनाते मजदूरों के लिये
पसीने में तर,,,रसोई में खाना बनाती स्त्री के लिये

ये सर्दियों में भी लिखते हैं,,,
रात में फुटपाथ पर सिकुड़े शराबियों के लिए
अलाव सेंकते,,,, गाँव के बूढों के लिए
रातों को उठ उठ कर बच्चे को ओढाती माँ के लिए

सबके लिये मन पिघलाते, लिखते ये शायर,,,
बरसात में अपने ह्रदय की हूक सुन पाते हैं
महसूस कर पाते हैं,,, अपने ही दर्द को
कहीं अंदर छुपा रखे प्रेम को कागज़ पर उकेरना चाहते हैं
ये बूँदें कभी उनको भिगो जाती हैं
मिलन की उमंग जगा जाती हैं कभी
कभी उनकी रूह तक सुलगा जाती हैं
बिछोह के दर्द को ताज़ा कर जाती हैं

लिखने दो इनको जी भर के
खुद को पहचानने और जाहिर करने का मौसम,,,,
इनके लिए बार-बार नहीं आता
समझो इनको, सराहो इनको, उत्साहित करो
कहीं घुट न जायें, कहीं खो न जायें

ये बरसात में उगे हुए तथाकथित शायर,,,,
शायद कभी,,,,,
साहित्य के लिए घनी छाँव वाला वृक्ष भी बन सकते हैं
-विभा

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