बेचैन मन

बाहर झाँकू भीतर झाँकू
ऊपर ताकूँ, नीचे ताकूँ
बेलगाम भागते से मन को,,अपने जिस्म पे कैसे टांकूँ

जाने किसके इंतज़ार में जागे
घड़ी की टिक-टिक के संग भागे
नींद पुकारे, मन भगाए
खुद को दो हिस्सों में बाँटू
बेलगाम भागते से मन को,,अपने जिस्म पे कैसे टांकूँ

बेवजह का शोर मचाये, कभी बिठाए कभी उठाये
चैन नही लेने दे पल भर, बेचैनी संग खेल रचाये
रोता है बच्चों के जैसा
थक के जब भी इसको डाँटू
बेलगाम भागते से मन को,,अपने जिस्म पे कैसे टांकूँ

राह किसी की तकती हरदम
सूनी आँखें, कोरे हैं नम
साँझ उतरती जाती मन में
साँसे होती जाती मद्धम
मुश्किल है एक रात काटनी,,,,,,,,
इस लम्बी उमर को कैसे काटूँ

बेलगाम भागते से मन को,,अपने जिस्म पे कैसे टांकूँ
-है

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