मैं

 मैं,,,,

क्या सच में मैं ही हूँ,,,

कभी सोचा ही नहीं कि मुझमें कोई #मैं भी है


जो भी मिला वो एहसान जता गया-

"मैंने तुम्हारे लिए ये किया, मैंने तुम्हारे लिए वो किया"

हर एक के #मैं का मान रखा- हाँ तुमने किया

लेकिन मेरा #मैं,,,,

न कभी मैंने दिखाया, न किसी ने देखना चाहा


जो भी मिला वो अपनी काबिलियत समझा गया

"मैं ये हूँ, मुझे वो आता है"

हर एक के मैं का सम्मान किया- हाँ तुम हो

लेकिन मेरा वजूद,,,,

न कभी मैंने दिखाया, न किसी ने देखना चाहा


क्या समझूँ खुद को अब

बिना अहम की #मैं,,, बिना वजूद की #मैं


#मैं_मानवी

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