जज़्बात

 कोई कहाँ खुद से खुद को पत्थर करता है

काम ये ज़ज़्बातों का कारीगर करता है


कभी एक कतरा भी, टिकता नहीं था पलकों पर

समंदर कोई दिल में आज जज़्ब करता है


पढ़ने वाले शायरी पढ़कर दाद देते हैं 

कोई तो मिले, जो आँखों को पढा करता है


बातें,,,,, बस ये बातें ही तो इश्क़ हैं वरना

आजकल कौन किसी से मिला-जुला करता है


हँसी के उजाले बाँटकर, उदासी ओढ़कर सो जाना

अक्सर इंसां खुद का ही गुनाहगार हुआ करता है

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