जीवन

 झूठ, छल, प्रपंच और धोखा

हमने कब किसी को रोका

जितना मिला लेते चले गये

हमने जमा किया भर भर खोखा


सीने पे कोई तीर चलाये

पीठ पे खंजर किसी ने भोंका

अपने हों, चाहे हो पराये

सबको ही तो मिला था मौका


मुस्कुराये हर वार झेलकर

दर्द को अपने कभी न भौंका

आंसू पर सौ सौ पहरे कसे

बत्तीसी को कभी न टोका


उम्र की काल कोठरी पर

आया कहाँ से हवा का झोंका

जाने क्यों ऊपर वाले ने

खुला छोड़ दिया एक झरोखा


सूखी अधखुली पलकों पर

पानी का क़तरा इक कौंधा

 पथरीली सी जमीनों पर

उग आया नन्हा सा पौधा


अरमानों को जिसने रौंदा

कोने में अब पड़ा है औंधा

स्वाद आया है ज़िन्दगी में

खट्टा, मीठा,चटपटा, सौंधा


#मानवी

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