परित्याग
क्या समझा था मुझे
एक खिलौना,,,
जब चाहा खेलोगे, जब चाहा फेंक दोगे
एक कठपुलती
जैसे चाहोगे नचाओगे, फिर कोने में डाल दोगे
एक पत्थर
जितनी चाहे चोट दोगे, तराशने के नाम पर
काश कि कभी मुझे इंसान भी समझा होता
जिसे दर्द होता है,,, चोट लगने पर
गुस्सा आता है,,,, हर वक़्त गलत समझने पर
आँसू आते हैं,,, छोड़ जाने पर
थकान होती है, इशारों पर नाचते हुए
कोफ्त होती है,,, बार बार अपना हक जताते हुए
काश,,, कि तुमने कभी अपनी गलती समझी होती
लेकिन पता है क्या,,,,
ये खिलौने, कठपुतली, पत्थर सब टूट सकते हैं
पर इंसान,,,,
उसे हुनर आता है
उबर जाने का...
हाँ, उबर गई हूँ मैं
तुम्हारी उस दिखावे की दुनिया से
तुम्हारे उस छलावे के रूप से
बहुत अलग थे,,,,
हमारे आदर्श, हमारे उसूल
हमारी आदतें, हमारा प्रेम को समझने, करने का नज़रिया,,,
और अब शायद...
हमारे रास्ते भी अलग हैं
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