ककहरा

 वीरान सी हैं आँखे इनमें समंदर बहुत गहरा है,

यादें मुस्कुराना चाहती हैं, उदासियों का पहरा है।


लुटा कर सब कुछ ही होश में आता है इन्सां,

यहाँ मुहब्बत बेअक्ली है और इश्क़ बहरा है।


बढ़ा कर बेतकल्लुफियाँ, तकल्लुफ से पेश आये जो

समझ लेना के उस चेहरे पर, एक और भी चेहरा है।


बिना मार खाये तुम एक अक्षर न सीख पाओगे,

#मानवी अभी तो बस ये, ज़िन्दगी का ककहरा है।

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