फागुन
माना कि बहुत दूर हूँ तुमसे
हाथ मुझ तक नहीं पहुँचेंगे तेरे
अपने रंग में तो कब से रंग दिए
तुम्हीं तो हो मेरे मन के चितेरे
लिखी थी उदासी जहाँ आंसुओ की सियाही से
मन को मेरे... पहले तुमने कोरा किया
वासंती सी मुस्कुराहट, आसमानी सी खुशियाँ
गुलाबी सा रंग.... प्यार का भर दिया
बेरंग सी मेरी जिंदगी में आकर
अनजानी ख्वाहिशों के नए रंग बिखेरे
तुम्हीं तो हो मेरे मन के चितेरे
बात मेरी मानो तो एक और काम करना
तुम्हारी ही कलाकृति हूँ, इसपे अपना नाम धरना
दुनिया पहचाने मुझे तेरे ही नाम से
मेरी हर कमी चाहे, तेरे हाथों ही सँवरना
दहक रही चौराहे पर होली की अग्नि
मन मेरा ले रहा... तेरे संग फेरे
तुम्हीं तो ही मेरे मन के चितेरे ❤️❤️
#मानवी
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