कविता

 कविता,,,,, दुख का राग है


खुश होती हूँ तो शब्दों का सूखा सा पड़ा रहता है

या शायद खुशी के पलों को शब्दों में बाँधना नहीं आता मुझे

जब तक दुखों का पहाड़ न टूटे

कविता का निर्झर बहता ही नहीं

आँखों से आँसुओ की जगह

उँगलियों से शब्द बहाती हूँ

तब ही मन की पीड़ा को हल्का कर पाती हूँ

मेरे आस पास रहने वाले कभी मेरा दर्द समझ ही नहीं पाए

आँसू जो नहीं दिखते मेरे किसी को

मुझे पढ़ने वाले मुझे अच्छे से जानते हैं

और भगवान,,,,,वो तो शायद मेरी कविताओं का दीवाना ही हो गया है

बहुत दिनों तक कुछ न लिखूँ तो दुख दे देता है

जिससे मेरा लिखना न रुके

झरना बहता रहे

दुख का राग गूँजता रहे

अनवरत.....


#मानवी

Comments

Popular posts from this blog

सावन की खूबसूरती

2 अक्टूबर