कविता
जीने के लिए सोचा ही नहीं,,,दर्द संभालने होंगे
मुस्कुराये तो मुस्कुराने के,,,,क़र्ज़ उतारने होंगे
मुस्कुराऊं कभी तो लगता है
जैसे होंठों पे क़र्ज़ रखा है
कविता,,,,, दुख का राग है
खुश होती हूँ तो शब्दों का सूखा सा पड़ा रहता है
या शायद खुशी के पलों को शब्दों में बाँधना नहीं आता मुझे
जब तक दुखों का पहाड़ न टूटे
कविता का निर्झर बहता ही नहीं
आँखों से आँसुओ की जगह
उँगलियों से शब्द बहाती हूँ
तभी मन की पीड़ा को हल्का कर पाती हूँ
शायद इसीलिए मेरे आस पास रहने वाले कभी मेरा दर्द समझ ही नहीं पाए
आँसू जो नहीं दिखते मेरे किसी को
मुझे पढ़ने वाले मुझे अच्छे से जानते हैं
और भगवान,,,,,वो तो शायद मेरी कविताओं का दीवाना ही हो गया है
बहुत दिनों तक कुछ न लिखूँ तो दुख दे देता है
जिससे मेरा लिखना न रुके
झरना बहता रहे
दुख का राग गूँजता रहे
-वििभा
मुस्कुराये तो मुस्कुराने के,,,,क़र्ज़ उतारने होंगे
मुस्कुराऊं कभी तो लगता है
जैसे होंठों पे क़र्ज़ रखा है
कविता,,,,, दुख का राग है
खुश होती हूँ तो शब्दों का सूखा सा पड़ा रहता है
या शायद खुशी के पलों को शब्दों में बाँधना नहीं आता मुझे
जब तक दुखों का पहाड़ न टूटे
कविता का निर्झर बहता ही नहीं
आँखों से आँसुओ की जगह
उँगलियों से शब्द बहाती हूँ
तभी मन की पीड़ा को हल्का कर पाती हूँ
शायद इसीलिए मेरे आस पास रहने वाले कभी मेरा दर्द समझ ही नहीं पाए
आँसू जो नहीं दिखते मेरे किसी को
मुझे पढ़ने वाले मुझे अच्छे से जानते हैं
और भगवान,,,,,वो तो शायद मेरी कविताओं का दीवाना ही हो गया है
बहुत दिनों तक कुछ न लिखूँ तो दुख दे देता है
जिससे मेरा लिखना न रुके
झरना बहता रहे
दुख का राग गूँजता रहे
-वििभा
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