कान्हा तेरे कितने रूप

मेरे घर के मंदिर में छोटी सी मूरत
बाहर तुझको ढूढूँ, क्या है ज़रूरत
भक्ति तेरी मन ही मन गूँज लेती हूँ
मूरत को कान्हा मान पूज लेती हूँ
---------------~
आँखों की चितवन में प्यारी सी सूरत
साथ हो न हो मेरे, क्या है ज़रूरत
राधा सी प्रेयसी, मीरा सी जोगन बन, घूम लेती हूँ
प्रियतम को कान्हा मान, उसे प्रेम कर लेती हूँ
--------------~
मेरे मन की बगिया में नन्ही सी कोंपल
किलकारियों से जिसकी भरा मेरा आँचल
नन्हे कदमो पे उसके, आसमाँ पसार देती हूँ
बेटे को कान्हा मान, उसे दुलार देती हूँ
---------------~
मेरे घर के आँगन में, निरीह सी काया
जीवन में जिसका ढलता वक़्त है आया
सहारा देकर थोड़ा उसे, ढेर आशीर्वाद लेती हूँ
बुजुर्गो को कान्हा मान, उनकी सेवा कर लेती हूँ
----------------~
पूजूँ तुझे, तुझे प्यार करूँ, सेवा करूँ तुझे दुलार करूँ
जितने रूप तू धर ले कान्हा, हर रूप में तेरा सिंगार करूँ
मंदिर तीरथ काहे जाऊँ, हर जीव में तेरा दर्शन हो
बस हाथ पकड़ लेना मेरा, जब भव सागर को पार करूँ
-विभा

Comments

Popular posts from this blog

सावन की खूबसूरती

2 अक्टूबर